कहीं बादल, कहीं बिजली, कहीं पूनम, कहीं छाया
अनोखे रूप में सावन, धरणि पर फिर उतर आया
कई प्रतिबिम्ब झीलों में, अनोखे चित्र से उभरे
कई आश्वस्त हो टूटे, किनारों पर सहज बिखरे
कही कोयल,कहीं बुलबुल,कहीं चातक विवश पाया
अनोखे रूप में सावन, धरणि पर फिर उतर आया
रचाती रास बूंदे सब , बिहँसती मुक्त आँगन में
विरह की वेदना उमड़ी , जमे दो अश्रु नयनन में
कहीं भीगे हुए मन हैं , कहीं भीगी हुयी काया
अनोखे रूप में सावन, धरणि पर फिर उतर आया
टपकता फूल से पानी , सिहरने पत्तियाँ लगती
किसी उन्मत्त माली की, कथा कहते हुए डरती
कहीं भँवरे, कहीं तितली, सभी के मन मदन छाया
अनोखे रूप में सावन, धरणि पर फिर उतर आया
छुपे तरु - कोटरों में अलि , बिहग दो केलि करते हैं
मदिर मादक मृदुल मनुहार , मन में मोद भरते हैं
कहीं नाचे मयूरा 'जय' , कहीं नाची मनुज - काया
अनोखे रूप में सावन, धरणि पर फिर उतर आया
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