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Wednesday, October 9, 2013

नव परिणीता



मन की अभिलाषाओं में अब, 
कुसुमाकर का वास हो चला 
फूलों पर हर पग है मेरा, 
मुट्ठी में आकाश हो चला ॥१॥ 

आँखों में मदिरा छलकी है, 
बाहों में अभिमान आ गया 
रोम रोम में वीणा गुंजित, 
हृदय में मादक गान आ गया ॥२॥ 

मधुमिश्रित वह समय भी आया, 
मधुर मिलन के जो पल थे 
मैं प्रियतम की बाहों में हूँ, 
गंगा जमुना ज्यों संगम में ॥३॥

दहक उठे हैं तन मन दोनों, 
मद-पूरित निज उच्छ्वास से 
देह-धार बह चली नदी सी, 
प्रथम पुरुष के अंक-पाश में ॥४॥

काया की कलिका चटकी तो, 
मुदित भ्रमर का नर्तन देखा 
कायिक-पराग के कर्षण में, 
नख-शिख तक स्पंदन देखा ॥५॥

मदनगन्ध प्रस्फुटित हुयी तो, 
तन-अंतर हो गया सुवासित 
अपमानित और तिरोहित तन को, 
आज मिला सम्मान असीमित ॥६॥

निशा बीतती पलक झपकते, 
ज्यों मेघ-तड़ित अनुराग रहे  
हे प्रभु! मेरी विनती सुन लो, 
मेरा अमर सुहाग रहे ॥७॥ 
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