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Thursday, February 4, 2010

नारी जीवन

( ६ )
एक पुरुष ने मुँह क्या फेरा , अब सबने मुँह मोड़ लिया है
साथी ने क्या साथ को छोड़ा , नाता सबने अब तोड़ लिया है
कल तक जो पायल की रुनझुन , बड़ी सुहावन लगती थी
दीर्घ मांग सिन्दूर से पूरित , सदा ही पावन लगती थी
किसी बधिक के धनुष सदृश थी , नैनों में काजल की रेखा
देख लालिमा ओष्ठ अधर की , प्रिय को सदा तृषित ही देखा
आज वही पायल की रुनझुन , बड़ी कर्कशा लगती है
स्वच्छ धवल सी मांग आज तो , सर्प दंश सी डसती है
काजल और अधर की लाली , ज्यों सपना कोई विगत हुआ
हँसी और मुस्कान रहित , यह जीवन जैसे नरक हुआ
आभूषण और वस्त्र रेशमी , दिए कभी जो अपनों ने
छूना भी अपराध इन्हें अब , डर लगता है सपनो में
हुयी अशेष सर्व अभिलाषा , रंग नहीं अब जीवन में
तड़ितपात का भय लगता , यदि समीप जाऊं दर्पण के
आह दैव ! यह कैसा जीवन , कैसा यह समाज का बंधन
निष्ठुर नियमों के कारण ही , हुयी मंगला आज अभागन
xxxxxxxxxxxxxxxxxx आह्वाहन xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
आओ युवको , अब कुछ सोचो , समय आत्म मंथन का है
कुछ सामाजिक वर्जनाओं में , आज महा परिवर्तन का है
सामाजिक हों , मर्यादित हों , किन्तु अव्यवहारिक ना हो
ऐसा रचे की जिससे कोई अब , पापित और शापित न हो

Wednesday, February 3, 2010

नारी जीवन

( ५ )
पलकों पर मधुरिम पल के तैर रहे थे कुछ सपने
केशराशि थी बिखरी बिखरी अस्त व्यस्त थे सब गहने
सुबह अभी शेष थी आनी उषा भी थी अलसाई
होंठों पर मुस्कान समेटे लेनी चाही एक अंगडाई
पूर्ण रूप से ले भी ना पाई अपनी स्वप्निल अंगड़ाई
तभी कही से चीख और फिर क्रंदन की ध्वनि आयी
मैं निस्तब्ध रही जब देखा प्रिय समक्ष किन्तु निस्पंदन
मैं हत भाग्य बनी विधवा और निरर्थक हो गया जीवन
कहाँ गए वे युगल पुरोहित जिन्होंने शुभदा लगन निकाली
वो मनिहारिन सामने आये जिसने चुडियाँ हाथ में डाली
कहाँ कमी रह गयी थी मुझसे जिससे यह दिन सामने आया
सास स्वसुर की सेवा की थी निशदिन गणपति तुम्हे मनाया
पीलापन है चटख अभी तक जो लगा हथेली पर हल्दी से
सूख न पाई अभी महावर लगी पगों में जो शादी पे
जिन नैनो को झील कहा था वे अश्रु सरोवर बने हुए हैं
नियम और संयम के बादल मम निमित्त अति घने हुए हैं

Tuesday, February 2, 2010

नारी जीवन

( ४ )
मन की अभिलाषाओं में अब कुसुमाकर का वास हो चला
फूलों पर हर पग है मेरा मुट्ठी में आकाश हो चला
आँखों में मदिरा छलकी है बाहों में अभिमान आ गया
रोम रोम में वीणा गुंजित हृदय में मादक गान आ गया
मधुमिश्रित वह समय भी आया जो कि मिलन के पल थे
मैं प्रियतम की बाँहों में हूँ , और प्रियतम मेरे आँचल में
दहक उठे हैं तन मन दोनों मद पूरित निज उच्छ्वास से
देह धार बह चली नदी सी प्रथम पुरुष के अंक पाश में
काया की कलिका चटकी तो मुदित भ्रमर का नर्तन देखा
कायिक पराग के कर्षण में नख सिख तक स्पंदन देखा
मदन गंध प्रस्फुटित हुयी तो तन अंतर हो गया सुवासित
मेरे अपमानित तन को जैसे आज मिला हो मान असीमित
संध्या और सुबह में मिलती सीख आशीषें सास स्वसुर से
देवर और ननद संग कटते दिवस काल अंत्यंत मधुर से
निशा बीतती पलक झपकते ज्यों मेघ तड़ित अनुराग रहे
हे प्रभु मेरी विनती सुनलो , " मेरा अमर सुहाग रहे "

Monday, February 1, 2010

नारी जीवन

( ३ )


बढ़ती हुयी सुता लगती है भारस्वरूपा अतिगुरुतर
लगे खोजने मात पिता अब मेरे लिए सुघड़ घरवर
सांझ ढले जब जल देती मैं पद प्रक्षालन करने को
तातश्री का चिंतित आनन कहजाता सारा कहने को
द्रवित नयन जननी के कहते उनके जीवन की पीड़ा
मुझे काटता सुता-भाव का प्रतिपल एक विषैला कीड़ा
वह सुखकारी संध्या आयी जब माँ ने माथा चूम लिया
मुझे लगा मेरे जीवन का समय चक्र अब घूम लिया
नयन पनीले हुए तात के मेरे सुख या अपने सुख से
चूड़ी संग आशीष मिले हैं मनिहारिन के श्री मुख से
वैवाहिक गीतों संग गूंजे हैं पुरोहितों के वेद गान
शुभ नक्षत्र शुभ घड़ियों में किया पिता ने कन्यादान
माँ ने गले लगा कर मुझको जी भरकर के रुदन किया
भरे कंठ और मंथर गति से पति गेह को गमन किया
छूटा संग आज वर्षों का आज मैं चली हो के पराई
बेटी से बन गयी आज मैं पत्नी , बहू और भौजाई

Wednesday, January 27, 2010

नारी जीवन

( २ )
देखे हैं मधुमास अष्ट दस मैंने जीवन में अब तक
यौवन के स्पर्श से पुलकित हुए हैं मन और तन के ऊतक
दिव्य धार बह रही हृदय में अधरों पर है पावन गान
रोम रोम में सौम्य समर्पण नयन ढूंढते हैं भगवान्
तरुणाई से अब तक जितना समय विताया है मैंने
देहरी से बाहर जाने को जब कदम बढाया है मैंने
जन मिले मुझे सामान्य बहुत उत्तम और अपने जैसे
किन्तु अधिक है संख्या उनकी जो लगे हेय सपने जैसे
हेय कहूं या दुष्ट कहूं या कहूं मैं पापी अत्याचारी
कुत्सित कुटिल कीट नरभक्षी आततायी या फिर व्यभिचारी
रोम रोम छलनी करने को व्याकुल से बहु मित्र मिले
बड़ी आयु के मिले सयाने पातक तनभेदी दृष्टि लिए
व्यक्त करूँ मैं पीड़ा किससे मात पिता या भाई से
सभी डांट कर कह देते हैं " बैठो , रहो सिधाई से "
निर्बाध घूमते पातक हैं पर मुझे चतुर्दिक मिलते ताना
निरअपराधिन दंड को भोगूँ कैसा यह समाज का बाना

Monday, January 25, 2010

नारी जीवन




( १ )


नारी के कितने जीवन हैं और कितनी परिभाषाएं हैं
नारी जीवन में तो केवल त्याग और अभिलाषाएं हैं

जनम लिया तो माता को मातृत्व का सुखद उपहार दिया
किन्तु कोख को कलुषित कह कर दादी ने तिरस्कार दिया

पिताश्री के मुख मंडल पर पीड़ा बन कर छाई हूँ
यूं लगे कि जैसे प्रलयंकारी स्थितियों को लाई हूँ

कलतक जो माँ थी पलकों पर आज नहीं कोई पूछने वाला
ताक रहे सब डरे डरे यूं सूंघ लिया ज्यों नाग ने काला

पिताश्री के कंधे पर सर रख माँ कल अंतिम बार हँसी थी
प्रसव की पीड़ा को भी उसने हंसी खुशी से सह ली थी

आज जननि का हृदय हो रहा है अगडित तानों से तार तार
दुःख से उबला रक्त और अब बह रही निरंतर अश्रुधार

उल्लासित स्वर ठिठक गए हैं मृतक हो गयी उत्सव चर्चा
स्वस्तिवचन मिल रहे मुझे अब , 'करमजली तू मर जा मर जा '

सुन्दर पल था गर्भ का जीवन किन्तु दुखद नव जीवन है
कोमल कोमल कोंपल का यह कैसा अद्भुद अभिनन्दन है