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Tuesday, February 2, 2010

नारी जीवन

( ४ )
मन की अभिलाषाओं में अब कुसुमाकर का वास हो चला
फूलों पर हर पग है मेरा मुट्ठी में आकाश हो चला
आँखों में मदिरा छलकी है बाहों में अभिमान आ गया
रोम रोम में वीणा गुंजित हृदय में मादक गान आ गया
मधुमिश्रित वह समय भी आया जो कि मिलन के पल थे
मैं प्रियतम की बाँहों में हूँ , और प्रियतम मेरे आँचल में
दहक उठे हैं तन मन दोनों मद पूरित निज उच्छ्वास से
देह धार बह चली नदी सी प्रथम पुरुष के अंक पाश में
काया की कलिका चटकी तो मुदित भ्रमर का नर्तन देखा
कायिक पराग के कर्षण में नख सिख तक स्पंदन देखा
मदन गंध प्रस्फुटित हुयी तो तन अंतर हो गया सुवासित
मेरे अपमानित तन को जैसे आज मिला हो मान असीमित
संध्या और सुबह में मिलती सीख आशीषें सास स्वसुर से
देवर और ननद संग कटते दिवस काल अंत्यंत मधुर से
निशा बीतती पलक झपकते ज्यों मेघ तड़ित अनुराग रहे
हे प्रभु मेरी विनती सुनलो , " मेरा अमर सुहाग रहे "