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Wednesday, March 17, 2010

हृदय दधीचि मर रहा है .......

अति समीप्यबोध को दूर तो हटाईये
हृदय दधीचि मर रहा है फिर परोपकार में
मन मयूर रो रहा है बादलों के शोर से
नयन मीन बन गए हैं प्रिय बिना त्यौहार में
चमक चमक दामिनी उर प्रदाह दे रही
या कि भार बढ़ गया है आज कंठ हार में
रक्त रंजिता हुयी हैं भावनाएं आज सब
कुचल कुचल के मर रही हैं मन महिष की मार से
चाहना यही है एक प्रिय बहुत समीप हो
एक बार आन मिलो अब असीम प्यार में
डूब चली शोक में पपीहरे की बूँद ' जय '
दग्ध हृदय , तप्त गात , मन है उदधि ज्वार में
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