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Thursday, March 4, 2010

कितना अच्छा होता

कितना अच्छा होता , यदि मैं एक ग़ज़ल बन जाऊं /
क्या बात हो कि उनके , होंठों से निकल कर आऊँ //
बन कर के एक बवंडर , डोलूं इधर उधर मैं ,
संग में पहाड़ , नदियाँ, जंगल व समंदर हैं ,
कई बार मिले हैं , मुझे कुछ और ठिकाने भी,
क्या बात हो कि उनके , आँचल से फिसल कर आऊँ /
क्या बात हो कि उनके , होंठों से निकल कर आऊँ //
ये कैसा रंग रूप है , ये कैसा मेरा जीवन ,
हैं व्यर्थ मेरी वाणी , श्वास और स्पंदन ,
हैं फूल हज़ारों खिले , मैं ऐसा बगीचा हूँ ,
क्या बात हो कि उनके , गजरे का कँवल बन जाऊँ /
क्या बात हो कि उनके , होंठों से निकल कर आऊँ //
काबा में सजदा करके , काशी में सर झुकाया ,
गुरूद्वारे में मत्था टेका , गिरजा में बैठ आया ,
विश्राम भला क्यों कर , पायेंगे कदम तबतक ,
क्या बात हो कि उनके, सपनों में टहल कर आऊँ /
क्या बात हो कि उनके , होंठों से निकल कर आऊँ //
जब वो नहीं समीप तो , मधुमास आग जैसा ,
कितना भी मेह बरसे , सावन है जेठ का सा ,
ये दृष्टि दोष है मेरा, या कुछ और बात है ' जय '
क्या बात हो कि उनकी , आँखों में मचल कर आऊँ /
क्या बात हो कि उनके , होंठों से निकल कर आऊँ //