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Saturday, November 9, 2013

उत्तमता …



उत्तमता की चाह में फिरते, बीहड़-बीहड़, नगर-नगर
नहीं समझ पाते क्या उत्तम, धन-सूरत-कपडे या घर
बहुत दिनों तक भटका है किंतु बाद में समझा 'जय'
नेत्र-पंथ-गत जो भी आता, वह  सब  तो  है ही नश्वर