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Monday, September 30, 2013



अभी तो चाँद देखा है, सितारे खूब देखे हैं
समुन्दर के सपूतों से, जवारे खूब देखे हैं 

नदी में झरने गिरते हैं व सागर में गिरे धारा 
बरफ बनती है जब झरने, नज़ारे खूब देखे हैं

उफनते है कभी दरिया तो साहिल दूर होते हैं 
गले मिलते नदी के कुछ किनारे खूब देखे हैं 

बहारें आती चुपके से,फिजाओं में पसर जाती
खिजां के आने जाने के, इशारे खूब देखे हैं 

कडकती ठण्ड में वायु सहमती सी चली आती 
मचलती धूप में बहते, हव्वारे खूब देखे हैं 

मुहब्बत रूह है लेकिन, रूहें कब मिला करती
बिना रूहों के पागल 'जय', बेचारे खूब देखे हैं 

Sunday, September 29, 2013

मनःसंताप दुष्कर है, हृदय पर दाब भारी है
स्मृतियों की चौखट में, यह कैसी लाचारी है

उमंगें मर गयी सारी, सपनों के चिथड़े हो गए
कल्पनाओं के पंख कटे, भावनाओं की बारी है

कौतूहल जिज्ञासा जैसे कहीं कन्दरा में जा बैठे
जिह्वा तालू से चिपकी है, दुबकी हँसी बिचारी है

आज नही है आसपास अब मित्र,सगा न अपना

ये कैसी दुनिया सारी है, ये कैसी दुनियादारी है

Saturday, September 28, 2013


( ६ )
एक पुरुष ने मुँह क्या फेरा , अब सबने मुँह मोड़ लिया है
साथी ने क्या साथ को छोड़ा , नाता सबने अब तोड़ लिया है
कल तक जो पायल की रुनझुन , बड़ी सुहावन लगती थी
दीर्घ मांग सिन्दूर से पूरित , सदा ही पावन लगती थी
किसी बधिक के धनुष सदृश थी , नैनों में काजल की रेखा
देख लालिमा ओष्ठ अधर की , प्रिय को सदा तृषित ही देखा
आज वही पायल की रुनझुन , बड़ी कर्कशा लगती है
स्वच्छ धवल सी मांग आज तो , सर्प दंश सी डसती है
काजल और अधर की लाली , ज्यों सपना कोई विगत हुआ
हँसी और मुस्कान रहित , यह जीवन जैसे नरक हुआ
आभूषण और वस्त्र रेशमी , दिए कभी जो अपनों ने
छूना भी अपराध इन्हें अब , डर लगता है सपनो में
हुयी अशेष सर्व अभिलाषा , रंग नहीं अब जीवन में
तड़ितपात का भय लगता , यदि समीप जाऊं दर्पण के
आह दैव ! यह कैसा जीवन , कैसा यह समाज का बंधन
निष्ठुर नियमों के कारण ही , हुयी मंगला आज अभागन
xxxxxxxxxxxxxxxxxx आह्वाहन xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
आओ युवको , अब कुछ सोचो , समय आत्म मंथन का है
कुछ सामाजिक वर्जनाओं में , आज महा परिवर्तन का है
सामाजिक हों , मर्यादित हों , किन्तु अव्यवहारिक ना हो
ऐसा रचे की जिससे कोई अब , पापित और शापित न हो

इस नदी के तलहटी के

इस नदी के तलहटी के , पत्थरों को देखिये /
आधारभूत पर्वतों के , दलदलों को देखिये //

तुम बसंत देख कर , गुनगुना रहे हो आज ,
पृष्ठभूमि के अनेक , पतझड़ों को देखिये //

पुष्प की सुगंध , छवि , मन को मोहने लगी ,
डाल पर छिपे , नुकीले , कंटकों को देखिये //

इस धरा की उच्चतम , अट्टालिकाएं देख कर ,
अब रसा के नींव के , रसातलों को देखिये //

सूखते सरित प्रवाह , लाख सत्य हों मगर ,
सागरों में आ रही , सुनामियों को देखिये //

व्योम चूमते हुए ये , धूम केतु क्षणिक हैं ,
राख में दबी हुयी , चिंगारियों को देखिये //

किसीकी ओर कर रहे , संकेत काल में स्वयं
अपनी ओर देखती, इन उँगलियों को देखिये //

तुम किसी को दुःख दो , ये सोचने के पूर्व ' जय '
निज ह्रदय प्रकोष्ठ की , उदासियों को देखिये //

तुम अपनी मुस्कराहट को

तुम अपनी मुस्कराहट को छुपा लोगे, ये हम माने
तुम अपने अश्क आँखों में छुपा पाओ तो हम जाने

सभी गिन लेते हैं उडती हुयी चिड़िया के पर लेकिन
रिमझिम में नचते मोर के गिनो गर पंख, हम जाने

तुम्हारे लाख जलवों को देखा हमने जी भर कर 
हमारे इक नज़ारे को जो तुम देखो तो हम जाने

हिदायत हम को देते हो कि सपनों से अलग रहना
अलग अपनों से दो पल को अगर होवो तो हम जाने

गले तुम सबके मिलते हो अपना क्या पराया क्या
मेरी बाहें खुली कब से, समा जाओ तो हम जाने

हमें तुम फूल कहते 'जय',व खुद को जलता अंगारा

मेरी उंगली जो जल जाए तुम्हे छूकर तो हम जाने 
हम रफ्ता रफ्ता 'जय' अपनी, पहचान बदलते जाते हैं 

इस भागदौड़ के आलम में,गिरतों को कुचलते जाते हैं
अन्ना ने जब बिगुल उठाया, कहीं न कोई आहट उभरी 
जैसे ही वह बिगुल बजा, जनजन में क्रान्तिलहर उभरी 
जन-लहर सुनामी जैसी थी,दिल्ली की सड़कें उफन गई 
नेताओं की लुटिया डूबी, फूट गयी 'जय' पाप की गगरी