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Wednesday, December 21, 2011

===किसी बाप से पूछो===


छोटी सी शल्य चिकित्सा, अपनी संतान की हो तो /
कितनी बड़ी हो जाती है, यह किसी बाप से पूछो //
यद्यपि तुम मात्र दो घंटो के बाद बाहर आगये थे
किन्तु शल्य चिकित्सा कक्ष के बंद द्वार को
सैकड़ों बार क्यों देखा है, यह किसी बाप से पूछो //
यह जानते हुए भी कि तुम्हे कोई गंभीर रोग नहीं है
शल्य चिकित्सा कक्ष से बाहर आते हुए चिकित्सकों को
प्रश्नभरी दृष्टि से क्यों देखा, यह किसी बाप से पूछो //
लेटे हुए हो चुपचाप शैय्या में, क्या सच में यह तुम्ही हो !
शांत और निस्तेज चेहरा देख कर लगता तो नहीं है कि
अभी पिछले दिनों ही तुमने अपना सत्रहवां जन्मदिन मनाया है
तुम्हे देख कर किसी छः माह के दुधमुहे की स्मृतियाँ
क्यों जाग्रत हो गयी हैं, यह किसी बाप से पूछो //
घर के बिस्तरों को छोटा बताते थे तुम, लगभग प्रतिदिन
चिकित्सालय की शैय्या में तुम उसी छः हाथ के अपने शरीर
के साथ सिकुड़े सिमटे से एक सिरे पर लेटे हो
ऐसे में हृदय में क्या क्या गुजरा है, यह किसी बाप से पूछो //
ग्लूकोज की बोतल से गिरती हुई बूंदे लगातार
टप...टप...टप...टप...टप...टप...टप...टप...टप....
उन्ही के सुर से ताल मिलाती हुए मेरी धड़कने
धक्..धक्..धक्..धक्..धक्..धक्..धक्..धक्..धक्...
अनथक..सतत..क्यों, किसी बाप से पूछो //
तुम्हारी शैय्या के पास कक्ष में शेष कुल
ग्यारह क़दमों की दूरी को मीलों की टहल में
लगातार चलते हुए कैसे बदला, यह किसी बाप से पूछो //
टहलते हुए तुम्हारे चेहरे पर जाती है दृष्टि हर बार
बहुत धीरे से पुकारता भी हूँ, 'बेटे... बेटे जी'
यद्यपि तुम अभी तक बोले तो नहीं किन्तु
अभी अपनी दोनों बाहों को फैलाओगे कि मैं तुम्हे गोद में उठा लूं
ऐसा क्यों लगता है, यह किसी बाप से पूछो //
मैं तुम्हारे ऊपर अपने बुढापे की अपेक्षाएं नहीं लादूँगा /
मैं तुमसे मेरे लिए आशाओं का तम्बू भी नहीं तानूँगा //
तुम पर हो राम की कृपा, तुम पर है शाम की कृपा
तुम शतायु हो बेटे, दीर्घायु हो बेटे, बस मैं यही कहूँगा //

Wednesday, October 26, 2011

एक चित्र हम सभी के पड़ोस का /
मित्रों, आओ इस दिवाली में एक दीपक इस घर के नाम पर भी जलाएं / यदि संभव हो तो इस घर को भी खुशियों की परिधि में कर लें /

ये कैसी दिवाली है !

कुछ शीत बसन्ती है, कुछ ताप भी मद्धिम है /
हर ओर उमंगें हैं और प्यार का संगम है /
इन सब के बीच बैठा एक निरंकार प्राणी /
हो उपवन जिसका उजड़ा, वो ऐसा माली है //
ये कैसी दिवाली है !

सूर्योदय से सूर्यास्त हुआ, वह थक कर के आया /
घर में भूखे बच्चे और रोगी पत्नी को पाया /
मुट्ठी में बंधे रूपये औषधि में हुए सब व्यय
मन उसका रुदन करता दिल खाली खाली है //
ये कैसी दिवाली है !

घर में है नहीं आटा, चावल भी अशेष हुए /
घुन वाले गेंहूं भी, अब आज विशेष हुए /
मिट्टी की टूटी हांडी में कुछ पकने वाला है
ना घर में कटोरा है ना चम्मच थाली है //
ये कैसी दिवाली है !

लाचारी और गरीबी को, ये बच्चे क्या समझेंगे /
कुछ देर ये हठ करके, ठुनकेंगे और रो देंगे /
हे देव! प्रभो! इस घर पे, 'जय' अबकी कृपा कर दो
इस घर में कभी क्या लक्ष्मी जी आने वाली है //
ये कैसी दिवाली है !