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Saturday, June 19, 2010

प्रेम की सूखी नदी

प्रेम की सूखी नदी की , तलहटी में बढ़ रहे हैं /
विरह के ये शंकु पत्थर, अब हृदय में गड़ रहे हैं //

प्रेम जल में तरणि ऊपर, स्वप्न बैठे थे अनेकों
ज्वार ने निगला सभी को बच न पाया एक देखो
आह कैसा समय आया पात द्रुम से झड रहे हैं /
विरह के ये शंकु पत्थर, अब हृदय में गड़ रहे हैं //

तट नहीं मिल पाया मुझको, मैं नदी में ही बहा
बह ना पाया कुछ पगों तक, प्रेम जल भी ना रहा
आगतों को बिन निहारे, हम विगत से लड़ रहे हैं /
विरह के ये शंकु पत्थर, अब हृदय में गड़ रहे हैं //

हर हृदय की कामना कि, वह छुए ऊंचा शिखर
भानु ना बन पाए तो फिर बन रहे हैं ग्रहण क्योंकर
कौन सा 'जय' काव्य इनका, गद्य कैसा पढ़ रहे हैं /
प्रेम की सूखी नदी की , तलहटी में बढ़ रहे हैं /
विरह के ये शंकु पत्थर, अब हृदय में गड़ रहे हैं //

Tuesday, June 15, 2010

क्यों डरते हो

जब हो प्रतिभा परिपूर्ण, पलायन क्यों करते हो ?
जीवन में संघर्ष सतत हों, पर क्यों डरते हो ??

क्षुधापूर्ति के लिए तुम्हे, कुछ अन्न जुटाना होगा /
तनावरण के लिए स्वयं ही, वस्त्र जुटाना होगा //
अन्न वस्त्र के साथ साथ , हे शिथिलमनः प्राणी !
शीत ताप से बचने को , एक भवन बनाना होगा //
जीवन की आवश्यकताओं से, तुम क्यों डरते हो ?
जब हो प्रतिभा परिपूर्ण, पलायन क्यों करते हो ?

तुम रुको नहीं, बढ़ चलो, सतत बढ़ते ही जाओ /
सिन्धु, शैल, सरिता पथ में हों, चढ़ते ही जाओ //
मत तोड़ो डोर प्रयासों की, जब हो जाओ असफल ,
सावधान हो, नयी विधा से, पुनः कार्य करते जाओ //
तुम अकर्मण्य मन बनो, स्वेद से क्यों डरते हो ?
जब हो प्रतिभा परिपूर्ण, पलायन क्यों करते हो ?

निज बाहों को फैला दो, तुमको क्षितिज मिलेगा /
पग दो पग तो चलो, तुम्हे भी लक्ष्य मिलेगा //
अरे ! पुष्प की चाहना करने वाले मानव ,
आज पौध तुम रोपो, कल को पुष्प खिलेगा //
अंक पाश में भरो सफलता, 'जय' क्यों डरते हो ?
जब हो प्रतिभा परिपूर्ण, पलायन क्यों करते हो ?
जीवन में संघर्ष सतत हों, तुम क्यों डरते हो ??

Thursday, June 3, 2010

नयन तुम्हारे भरवाँ करेले

होंठ तुम्हारे रसीली सब्जी
दोनों गाल पराठे कुरमुर
नयन तुम्हारे भरवाँ करेले
कान तुम्हारे पापड चुरमुर

नाभि तुम्हारी दूध कटोरी
कमर कि जैसे प्याज के छल्ले
गरदन सुन्दर शिमला मिर्ची
भरे नितम्ब दही के भल्ले

मोहन भोग रसीले यौवन
है चटनी की सुन्दर प्याली
'जय' बाहें है सेम की फलियाँ
गाजर जैसी टाँगे निराली